Kankaal

December 8, 2020
Kankaal

प्रतिष्ठान के खँडहर में और गंगा-तट की सिकता-भूमि में अनेक शिविरऔर फूस के झोंपड़े खड़े हैं। माघ की अमावस्या की गोधूली में प्रयागमें बाँध पर प्रभात का-सा जनरव और कोलाहल तथा धर्म लूटने की धूम कम होगयी है; परन्तु बहुत-से घायल और कुचले हुए अर्धमृतकों की आर्तध्वनि उसपावन प्रदेश को आशीर्वाद दे रही है। स्वयं-सेवक उन्हें सहायतापहुँचाने में व्यस्त हैं। यों तो प्रतिवर्ष यहाँ पर जन-समूह एकत्रहोता है, पर अब की बार कुछ विशेष पर्व की घोषणा की गयी थी, इसलिए भीड़अधिकता से हुई।कितनों के हाथ टूटे, कितनों का सिर फूटा और कितने ही पसलियों कीहड्डियाँ गँवाकर, अधोमुख होकर त्रिवेणी को प्रणाम करने लगे। एक नीरवअवसाद संध्या में गंगा के दोनों तट पर खड़े झोंपड़ी पर अपनी कालिमाबिखेर रहा था। नंगी पीठ घोड़ों पर नंगे साधुओं के चढ़ने का जो उत्साहथा, जो तलवार की फिकैती दिखलाने की स्पर्धा थी, दर्शक-जनता पर बालू कीवर्षा करने का जो उन्माद था, बड़े-बड़े कारचोबी झंडों को आगे से चलनेका जो आतंक था, वह सब अब फीका हो चला था।एक छायादार डोंगी जमुना के प्रशांत वक्ष को आकुलित करती हुई गंगाकी प्रखर धारा को काटने लगी-उस पर चढ़ने लगी। माझियों ने कसकर दौड़लगायी। नाव झूँसी के तट पर जा लगी। एक सम्भ्रान्त सज्जन और युवती, साथमें एक नौकर उस पर से उतरे। पुरुष यौवन में होने पर भी कुछ खिन्न-साथा, युवती हँसमुख थी; परन्तु नौकर बड़ा ही गंभीर बना था। यह सम्भवतःउस पुरुष की प्रभावशालिनी शिष्टता की शिक्षा थी। उसके हाथ में एक बाँसकी डोलची थी, जिसमें कुछ फल और मिठाइयाँ थीं। साधुओं के शिविरों कीपंक्ति सामने थी, वे लोग उसकी ओर चले। सामने से दो मनुष्य बातें करतेआ रहे थे-'ऐसी भव्य मूर्ति इस मेले भर में दूसरी नहीं है।''जैसे साक्षात् भगवान् का अंश हो।''अजी ब्रह्मचर्य का तेज है।''अवश्य महात्मा हैं।'वे दोनों चले गये।यह दल उसी शिविर की ओर चल पड़ा, जिधर से दोनों बातें करते आ रहेथे। पटमण्डप के समीप पहुँचने पर देखा, बहुत से दर्शक खड़े हैं। एकविशिष्ट आसन पर एक बीस वर्ष का युवक हलके रंग का काषाय वस्त्र अंग परडाले बैठा है। जटा-जूट नहीं था, कंधे तक बाल बिखरे थे। आँखें संयम केमद से भरी थीं। पुष्ट भुजाएँ और तेजोमय मुख-मण्डल से आकृति बड़ीप्रभावशालिनी थी। सचमुच, वह युवक तपस्वी भक्ति करने योग्य था। आगन्तुकऔर उसकी युवती स्त्री ने विनम्र होकर नमस्कार किया और नौकर के हाथ सेलेकर उपहार सामने रखा। महात्मा ने सस्नेह मुस्करा दिया। सामने बैठेहुए भक्त लोग कथा कहने वाले एक साधु की बातें सुन रहे थे। वह एक छन्दकी व्याख्या कर रहा था-'तासों चुप ह्वै रहिये'। गूँगा गुड़ का स्वादकैसे बतावेगा; नमक की पतली जब लवण-सिन्धु में गिर गई, फिर वह अलग होकरक्या अपनी सत्ता बतावेगी! ब्रह्म के लिए भी वैसे ही 'इदमित्यं' कहनाअसम्भव है, इसलिए महात्मा ने कहा-'तासों चुप ह्वै रहिये'।