11 Vars Ka Samay

December 8, 2020
11 Vars Ka Samay

दिन-भर बैठे-बैठे मेरे सिर में पीड़ा उत् पन् न हुई : मैं अपने स्थान से उठा और अपने एक नए एकांतवासी मित्र के यहाँ मैंने जाना विचारा।जाकर मैंने देखा तो वे ध् यान-मग् न सिर नीचा किए हुए कुछ सोच रहे थे।मुझे देखकर कुछ आश् चर्य नहीं हुआ; क् योंकि यह कोई नई बात नहीं थी।उन् हें थोड़े ही दिन पूरब से इस देश मे आए हुआ है। नगर में उनसे मेरेसिवा और किसी से विशेष जान-पहिचान नहीं है; और न वह विशेषत: किसी सेमिलते-जुलते ही हैं। केवल मुझसे मेरे भाग् य से, वे मित्र-भाव रखतेहैं। उदास तो वे हर समय रहा करते हैं। कई बेर उनसे मैंने इस उदासीनताका कारण पूछा भी; किंतु मैंने देखा कि उसके प्रकट करने में उन् हें एकप्रकार का दु:ख-सा होता है; इसी कारण मैं विशेष पूछताछ नहींकरता।मैंने पास जाकर कहा, "मित्र! आज तुम बहुत उदास जान पड़ते हो। चलोथोड़ी दूर तक घूम आवें। चित्त बहल जाएगा।"वे तुरंत खड़े हो गए और कहा,"चलो मित्र, मेरा भी यही जी चाहता है मैं तो तुम् हारे यहाँ जानेवालाथा।"हम दोनों उठे और नगर से पूर्व की ओर का मार्ग लिया। बाग के दोनोंओर की कृषि-सम् पन् न भूमि की शोभा का अनुभव करते और हरियाली के विस्तृत राज् य का अवलोकन करते हम लोग चले। दिन का अधिकांश अभी शेष था,इससे चित्त को स्थिरता थी। पावस की जरावस् था थी, इससे ऊपर से भी किसीप्रकार के अत् याचार की संभावना न थी। प्रस् तुत ऋतु की प्रशंसा भी हमदोनों बीच-बीच में करते जाते थे।