Aahuti

December 8, 2020
Aahuti

आनन्द ने गद्देदार कुर्सी पर बैठकर सिगार जलाते हुए कहा-आज विशम्भरने कैसी हिमाकत की! इम्तहान करीब है और आप आज वालण्टियर बन बैठे। कहींपकड़ गये, तो इम्तहान से हाथ धोएँगे। मेरा तो खयाल है कि वजीफ़ा भीबन्द हो जाएगा।सामने दूसरे बेंच पर रूपमणि बैठी एक अखबार पढ़ रही थी।उसकी आँखें अखबार की तरफ थीं; पर कान आनन्द की तरफ लगे हुए थे।बोली-यह तो बुरा हुआ। तुमने समझाया नहीं? आनन्द ने मुँह बनाकर कहा-जबकोई अपने को दूसरा गाँधी समझने लगे, तो उसे समझाना मुश्किल हो जाताहै। वह उलटे मुझे समझाने लगता है।रूपमणि ने अखबार को समेटकर बालों कोसँभालते हुए कहा-तुमने मुझे भी नहीं बताया, शायद मैं उसे रोकसकती।आनन्द ने कुछ चिढक़र कहा-तो अभी क्या हुआ, अभी तो शायद काँग्रेसआफिस ही में हो। जाकर रोक लो।आनन्द और विशम्भर दोनों ही यूनिवर्सिटीके विद्यार्थी थे। आनन्द के हिस्से में लक्ष्मी भी पड़ी थी, सरस्वतीभी; विशम्भर फूटी तकदीर लेकर आया था। प्रोफेसरों ने दया करके एकछोटा-सा वजीफा दे दिया था। बस, यही उसकी जीविका थी। रूपमणि भी साल भरपहले उन्हीं के समकक्ष थी; पर इस साल उसने कालेज छोड़ दिया था।स्वास्थ्य कुछ बिगड़ गया था। दोनों युवक कभी-कभी उससे मिलने आते रहतेथे।