Meri Pahli Rachna

December 8, 2020
Meri Pahli Rachna

उस वक्त मेरी उम्र कोई १३ साल की रही होगी। हिन्दी बिल्कुल न जानताथा। उर्दू के उपन्यास पढ़ने-लिखने का उन्माद था। मौलाना शरर, पं०रतननाथ सरशार, मिर्जा रुसवा, मौलवी मुहम्मद अली हरदोई निवासी, उस वक्तके सर्वप्रिय उपन्यासकार थे। इनकी रचनाएँ जहाँ मिल जाती थीं, स्कूल कीयाद भूल जाती थी और पुस्तक समाप्त करके ही दम लेता था। उस जमाने मेंरेनाल्ड के उपन्यासों की धूम थी। उर्दू में उनके अनुवाद धड़ाधड़ निकलरहे थे और हाथों-हाथ बिकते थे। मैं भी उनका आशिक था। स्व० हजरत रियाज़ने जो उर्दू के प्रसिद्ध कवि थे और जिनका हाल में देहान्त हुआ है,रेनाल्ड की एक रचना का अनुवाद 'हरम सरा' के नाम से किया था। उस जमानेमें लखनऊ के साप्ताहिक 'अवध-पंच' के सम्पादक स्व० मौलाना सज्जाद हुसेनने, जो हास्यरस के अमर कलाकार हैं, रेनाल्ड के दूसरे उपन्यास काअनुवाद 'धोखा' या 'तिलस्मी फ़ानूस' के नाम से किया था। ये सारीपुस्तकें मैंने उसी जमाने में पढ़ीं और पं० रतननाथ सरशार से तो मुझेतृप्ति न होती थी। उनकी सारी रचनाएँ मैंने पढ़ डालीं। उन दिनों मेरेपिता गोरखपुर में रहते थे और मैं भी गोरखपुर ही के मिशन स्कूल मेंआठवें में पढ़ता था, जो तीसरा दरजा कहलाता था। रेती पर एक बुकसेलरबुद्धिलाल नाम का रहता था। मैं उसकी दूकान पर जा बैठता था और उसकेस्टाक से उपन्यास ले-लेकर पढ़ता था; मगर दूकान पर सारे दिन तो बैठ नसकता था, इसलिए मैं उसकी दूकान से अँग्रेजी पुस्तकों की कुंजियाँ औरनोट्स लेकर अपने स्कूल के लडक़ों के हाथ बेचा करता था और इसके मुआवजेमें दूकान से उपन्यास घर लाकर पढ़ता था। दो-तीन वर्षों में मैंनेसैकड़ों ही उपन्यास पढ़ डाले होंगे। जब उपन्यासों का स्टाक समाप्त होगया, तो मैंने नवलकिशोर प्रेस से निकले हुए पुराणों के उर्दू अनुवादभी पढ़े, और 'तिलस्मी होशरुबा' के कई भाग भी पढ़े। इस वृहद् तिलस्मीग्रन्थ के १७ भाग उस वक्त निकल चुके थे और एक-एक भाग बड़े सुपररायल केआकार के दो-दो हज़ार पृष्ठों से कम न होगा। और इन १७ भागों के उपरान्तउसी पुस्तक के अलग-अलग प्रसंगों पर पचीसों भाग छप चुके थे। इनमें सेभी मैंने पढ़े। जिसने इतने बड़े ग्रन्थ की रचना की, उसकी कल्पना-शक्तिकितनी प्रबल होगी, इसका केवल अनुमान किया जा सकता है। कहते हैं, येकथाएँ मौलाना फैजी ने अकबर के विनोदार्थ फारसी में लिखी थीं। इनमेंकितना सत्य है, कह नहीं सकता; लेकिन इतनी वृहद् कथा शायद ही संसार कीकिसी भाषा में हो। पूरी एंसाइक्लोपीडिया समझ लीजिए। एक आदमी तो अपने६० वर्ष के जीवन में उनकी नकल भी करना चाहे, तो नहीं कर सकता। रचना तोदूसरी बात है।