Ghar Jamai Aur Dhikkar

December 8, 2020
Ghar Jamai Aur Dhikkar

घर जमाईहरिधन जेठ की दुपहरी में ऊख में पानी देकर आया और बाहर बैठारहा। घर में से धुआँ उठता नजर आता था। छन-छन की आवाज भी आ रही थी।उसके दोनों साले उसके बाद आये और घर में चले गए। दोनों सालों के लड़केभी आये और उसी तरह अंदर दाखिल हो गये; पर हरिधन अंदर न जा सका। इधर एकमहीने से उसके साथ यहाँ जो बर्ताव हो रहा था और विशेषकर कल उसे जैसीफटकार सुननी पड़ी थी, वह उसके पाँव में बेड़ियाँ-सी डाले हुए था। कलउसकी सास ही ने तो कहा, था, मेरा जी तुमसे भर गया, मैं तुम्हारीजिंदगी-भर का ठीका लिये बैठी हूँ क्या ? और सबसे बढ़कर अपनी स्त्री कीनिष्ठुरता ने उसके हृदय के टुकड़े-टुकड़े कर दिये थे। वह बैठी यहफटकार सुनती रही; पर एक बार तो उसके मुँह से न निकला, अम्माँ, तुमक्यों इनका अपमान कर रही हो ! बैठी गट-गट सुनती रही। शायद मेरीदुर्गति पर खुश हो रही थी। इस घर में वह कैसे जाय ? क्या फिर वहीगालियाँ खाने, वही फटकार सुनने के लिए ? और आज इस घर में जीवन के दससाल गुजर जाने पर यह हाल हो रहा है। मैं किसी से कम काम करता हूँ ?दोनों साले मीठी नींद सो रहते हैं और मैं बैलों को सानी-पानी देताहूँ; छाँटी काटता हूँ। वहाँ सब लोग पल-पल पर चिलम पीते हैं, मैं आँखेंबन्द किये अपने काम में लगा रहता हूँ। संध्या समय घरवाले गाने-बजानेचले जाते हैं, मैं घड़ी रात तक गाय-भैंसे दुहता रहता हूँ। उसका यहपुरस्कार मिल रहा है कि कोई खाने को भी नहीं पूछता। उल्टे गालियाँमिलती हैं।उसकी स्त्री घर में से डोल लेकर निकली और बोली- जरा इसेकुएँ से खींच लो। एक बूँद पानी नहीं है।हरिधन ने डोल लिया और कुएँ सेपानी भर लाया। उसे जोर की भूख लगी हुई थी, समझा अब खाने को बुलानेआवेगी; मगर स्त्री डोल लेकर अंदर गयी तो वहीं की हो रही। हरिधनथका-माँदा क्षुधा से व्याकुल पड़ा-पड़ा सो गया।————————-धिक् कारअनाथऔर विधवा मानी के लिये जीवन में अब रोने के सिवा दूसरा अवलंब न था। वहपाँच वर्ष की थी, जब पिता का देहांत हो गया। माता ने किसी तरह उसकापालन किया। सोलह वर्ष की अवस्था में मुहल्ले वालों की मदद से उसकाविवाह भी हो गया पर साल के अंदर ही माता और पति दोनों विदा हो गये। इसविपत्ति में उसे उपने चचा वंशीधर के सिवा और कोई नजर न आया, जो उसेआश्रय देता। वंशीधर ने अब तक जो व्यवहार किया था, उससे यह आशा न होसकती थी कि वहाँ वह शांति के साथ रह सकेगी पर वह सब कुछ सहने और सबकुछ करने को तैयार थी। वह गाली, झिड़की, मारपीट सब सह लेगी, कोई उस परसंदेह तो न करेगा, उस पर मिथ्या लांछन तो न लगेगा, शोहदों और लुच्चोंसे तो उसकी रक्षा होगी । वंशीधर को कुल मर्यादा की कुछ चिंता हुई।मानी की याचना को अस्वीकार न कर सके।लेकिन दो चार महीने में ही मानीको मालूम हो गया कि इस घर में बहुत दिनों तक उसका निबाह न होगा। वह घरका सारा काम करती, इशारों पर नाचती, सबको खुश रखने की कोशिश करती पर नजाने क्यों चचा और चची दोनों उससे जलते रहते। उसके आते ही महरी अलग करदी गयी। नहलाने-धुलाने के लिये एक लौंडा था उसे भी जवाब दे दिया गयापर मानी से इतना उबार होने पर भी चचा और चची न जाने क्यो उससे मुँहफुलाये रहते। कभी चचा घुड़कियाँ जमाते, कभी चची कोसती, यहाँ तक किउसकी चचेरी बहन ललिता भी बात-बात पर उसे गालियाँ देती। घर-भर में केवलउसके चचेरे भाई गोकुल ही को उससे सहानुभूति थी। उसी की बातों में कुछस्नेह का परिचय मिलता था । वह उपनी माता का स्वभाव जानता था। अगर वहउसे समझाने की चेष्टा करता, या खुल्लमखुल्ला मानी का पक्ष लेता, तोमानी को एक घड़ी घर में रहना कठिन हो जाता, इसलिये उसकी सहानुभूतिमानी ही को दिलासा देने तक रह जाती थी। वह कहता- बहन, मुझे कहीं नौकरहो जाने दो, फिर तुम्हारे कष्टों का अंत हो जायगा। तब देखूँगा, कौनतुम्हें तिरछी आँखों से देखता है। जब तक पढ़ता हूँ, तभी तक तुम्हारेबुरे दिन हैं। मानी ये स्नेह में डूबी हुई बात सुनकर पुलकित हो जातीऔर उसका रोआँ-रोआँ गोकुल को आशीर्वाद देने लगता।